RELATIONSHIP BETWEEN
"MOTHER AND DAUGHTER"
इस संसार में ईश्वर की बनाई हुई सबसे सुन्दर कृति /रचना
नारी को माना जाता है क्यूँकि एक औरत घर को संवारने / सजाने के
साथ -साथ , अन्नपूर्णा बनकर पूरे परिवार का ख्याल रखती है।
जब संसार की रचना हुई तभी से नारी को इस संसार की
सृष्टि को आगे बढ़ाने में "माँ" बनकर संपूर्ण नारीत्व प्राप्त हुआ।
सम्बन्धों की जब बात की जाती है तो एक औरत कई
रिश्तों में बंधी मिलती है और इन सभी रिश्तों में कभी बहू बनकर,
कहीं भाभी , बहन ,ननद , सास ,नानी ,दादी , तो कहीं बेटी।
देखा जाए तो एक औरत , बेटी बनकर पूरी ज़िन्दगी सारी
भूमिकायें बहुत ही प्रेम और कड़े नियमों को मान कर निभाती है।
किसी भी परिवार को देखा जाए तो वहां बेटियां अपने आँगन
में हंसती - खिलखिलाती , अपनी शिक्षा पूरी करती बड़ी हो रही होती हैं
लेकिन उनकी सही परवरिश की ज़िम्मेदारी उसकी माँ को ही सौंप दी
जाती है।
" क्या कभी आपने सोचा है कि किसी भी लड़की की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी माँ को ही क्यूँ सौंपी जाती है ?"
क्यूँकि एक माँ अपनी बेटी को नौ महीने तक अपनी कोख़ में रखती है और तभी से माँ अपनी बेटी की हर आहट , हर धड़कन को पहचानती है और सबसे खास बात यह कि बेटी के मन को , जरूरतों को, एक माँ खुद एक औरत होने की वज़ह से अच्छी तरह समझ सकती है।
"अब बात करते हैं कि माँ और बेटी के सम्बन्ध कैसे होने चाहिये।"
जब तक बेटियां छोटी होती हैं तब तक बेटी भी अपनी माँ को
अपना आदर्श / roll model मानती है और माँ भी अपनी बेटी को हर
सुख -सुविधा देती है। बचपन से ही सही - गलत का फर्क एक माँ ही
अपनी बेटी को समझाती है।
ज्यों ज्यों बेटी की उम्र बढ़ती है , बेटी का खुद का दायरा भी
बढ़ता जाता है तब उसकी अपनी समझ भी बढ़ने लगती है , उसकी
शिक्षा , बेटी को सही -गलत की समझ अपने नज़रिये से समझ आने
लगती हैं और फिर शुरु होते है वो सवाल , जिसका जवाब माँ कभी
कभी जानते हुए नहीं दे पाती।
21st century / 21 वीं सदी , माँ और बेटी को आपसी
सम्बन्धों को निभाने में बहुत सक्षम बना रही है। आज माँ -बेटी के
सम्बन्ध दोस्ताना हो गए हैं। आज माँ बेटी के लिये फैसले लेती है और
बेटी भी अपनी माँ को भरपूर सहयोग करती है। ऐसा नहीं है कि
आपस में माँ -बेटी की तकरार नहीं होती , आज भी बहुत सारे प्रश्न होते
है बेटियों के लेकिन माँ के पास भी सटीक जवाब होता है जो पहले मायें
नहीं दे पाती थी क्यूँकि एक लेवल के बाद पिता या बड़ा भाई या घर के
बुज़ुर्ग सदस्य ही उसका जवाब देते थे।
अगर कोई परिवार अपनी बेटियों को सही परवरिश ,
सही - गलत का फैसला कैसे करना है , ख़ुद को कितने लेवल / कितनी
सीमाओं तक सीमित रखना है , यह सब समझा देता है , खासकर माँ ,
और बेटियाँ भी थोड़ा सा अपनी समझ - बूझ को विकसित करके
अपनी माँ के साथ अपने सम्बन्ध और अपना जीवन दोनों ही बेहतर
बना सकती है।
हमेशा बेटियों को इस बात के लिए अपनी माँ का सम्मान
करना चाहिये कि जिन बातों के लिये उनकी माँ को permission /
सहमति नहीं मिली "उच्च -शिक्षा , अकेले सफ़र करना , घूमना
-फिरना , education के लिये hostel में रहना , और भी life के बहुत
सारे question -marks ??????????????????
आज 21 वीं सदी में , कोई भी , किसी भी क्षेत्र में अपना मुकाम
बना सकता है।
सही मायने में देखा जाए तो माँ -बेटी के पास साथ में
जीवन जीने के लिये सिर्फ़ ज़िन्दगी के 25 साल ही होते हैं बाकी का
जीवन तो दूसरे संबंधों को निभाने की ओर मुड़ जाता है इसलिये और
भी बहुत जरुरी है कि माँ -बेटी मिलकर अपनी ज़िन्दगी में ऐसे प्रयास
करें जिससे माँ भी और बेटी भी समाज के सामने अपना सिर ऊंचा
करके रहें।
देखा जाए तो माँ - बेटी का सम्बन्ध वास्तव में बहुत
खूबसूरत होता है। आपसी समझ और प्यार से इसे और भी खूबसूरत
बनाया जा सकता है।
🙏😊🙏
Beautifully written 🌹
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